सोनम वांगचुक को एक ‘रियल हीरो’ माना जाए या नहीं

सत्ता की भूख जब संवाद को निगल जाती है, तब लोकतंत्र का दम घुटने लगता है।

नीट हो या अन्य प्रतियोगी परीक्षाएँ—पेपर लीक ने लाखों युवाओं के सपनों को बार-बार कुचला है।कई छात्र हताश होकर आत्महत्या जैसे कदम उठा रहे हैं, लगातार मौतें जारी है। जंतर-मंतर पर युवा धरने पर बैठे हैं, प्रख्यात पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक और अन्य लोग 15 दिनों से अधिक समय से भूख हड़ताल पर हैं, लेकिन सरकार की ओर से सार्थक संवाद की पहल नज़र नहीं आती।

सवाल यह है कि क्या संवाद अब लोकतंत्र का हिस्सा नहीं रहा? या सत्ता इतनी आत्मविश्वासी हो गई है कि असहमति सुनना भी ज़रूरी नहीं समझती? यदि शिक्षा व्यवस्था बार-बार ऐसे संकटों से गुजर रही है, तो जवाबदेही किसकी है?

भारत की शिक्षा व्यवस्था में व्यापक, पारदर्शी और जवाबदेह सुधार की आवश्यकता है। यह केवल छात्रों का नहीं, पूरे देश के भविष्य का प्रश्न है।

देश के युवाओं से अपील है: अपने अधिकारों, निष्पक्ष परीक्षा व्यवस्था और बेहतर शिक्षा प्रणाली के लिए लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज़ उठाइए। क्योंकि जब युवा चुप हो जाते हैं, तब व्यवस्था सवालों से नहीं, सन्नाटे से चलने लगती है।