स्वास्थ्य ब्लॉग
फ़ैटी लिवर के बारे में कैसे पता चलता है और इससे बचने के लिए क्या जानना है ज़रूरी
हममें से ज़्यादातर लोग लिवर (जिगर) के बारे में बहुत कम जानते हैं. लेकिन यह हमारे शरीर का ऐसा अहम अंग है, जो हमें स्वस्थ रखने में बड़ी भूमिका निभाता है.
अक्सर हम इसकी देखभाल तभी करते हैं, जब इसमें कोई परेशानी आ जाती है. आज हम लिवर से जुड़ी बीमारियों, उनके लक्षण और उनसे बचाव के तरीक़ो के बारे में बात करेंगे.
इस विषय पर हमने डॉ. गौतम कुमार से बातचीत की. वो भागलपुर में अच्छे और प्रसिद्ध डॉक्टरों माने जाते हैं
सवाल: आजकल बहुत से लोगों को फ़ैटी लिवर की समस्या हो रही है. इसकी वजह क्या है?
जवाब: फ़ैटी लिवर का मतलब है कि लिवर में ज़रूरत से ज़्यादा चर्बी (फ़ैट) जमा हो जाना. भारत में यह समस्या लगातार बढ़ रही है.
1980 तक माना जाता था कि फ़ैटी लिवर सिर्फ़ ज़्यादा शराब पीने की वजह से होता है. लेकिन बाद में दुनिया भर में हुई रिसर्च से पता चला कि बिना शराब पिए भी लिवर में फ़ैट जमा हो सकता है.
यह फ़ैट लिवर की कोशिकाओं को नुक़सान पहुंचाता है, जिससे लिवर में सूजन, गंभीर बीमारी और यहां तक कि कैंसर का ख़तरा भी बढ़ सकता है.
दुर्भाग्य से पिछले 10 सालों में यह समस्या बहुत तेज़ी से बढ़ी है. पहले कहा जाता था कि भारत डायबिटीज़ की राजधानी बन रहा है, लेकिन अब फ़ैटी लिवर के मरीज़ उससे भी ज़्यादा हो गए हैं.
अगर मौजूदा अनुमान की बात करें, तो भारत में करीब 12 करोड़ लोग फ़ैटी लिवर की समस्या से जूझ रहे हैं.
इसके अलावा डायबिटीज़, हाई कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड का बढ़ना और मोटापा भी फ़ैटी लिवर होने की बड़ी वजहें हैं.
लिवर का फ़ैटी होना कैसे पता चलता है?
सवाल: क्या शराब पीने वाले लोगों में फ़ैटी लिवर होने का ख़तरा ज़्यादा होता है? इसमें कितनी सचाई है?
जवाब: यह पूरी तरह सच है कि शराब पीने से लिवर को नुक़सान पहुंचता है. लेकिन अब एक नई और बड़ी समस्या भी सामने आ गई है. बड़ी संख्या में ऐसे युवाओं में भी फ़ैटी लिवर की शिकायत मिल रही है, जो शराब नहीं पीते. अगर समय रहते इसका इलाज या बचाव न किया जाए, तो आगे चलकर यह लिवर की दूसरी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है.
कई मामलों में स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि मरीज़ को लिवर ट्रांसप्लांट तक करवाना पड़ सकता है.
यह एक बेहद गंभीर स्वास्थ्य समस्या है. इसके बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ाना बहुत ज़रूरी है. साथ ही, सरकार को भी इस समस्या से निपटने के लिए प्रभावी नीतियाँ और योजनाएँ बनानी चाहिए.
सवाल: किसी व्यक्ति को कैसे पता चलता है कि उसका लिवर फ़ैटी हो रहा है?
जवाब: फ़ैटी लिवर की शुरुआती अवस्था में आमतौर पर कोई ख़ास लक्षण दिखाई नहीं देते. ज़्यादातर लोगों को इसका पता तब चलता है, जब बीमारी काफ़ी बढ़ चुकी होती है.
अगर समय रहते इसका पता लगाना हो, तो नियमित जांच (स्क्रीनिंग) कराना ज़रूरी है. इसके लिए कुछ ब्लड टेस्ट किए जाते हैं. इसके अलावा फाइब्रोस्कैन और इलास्टोग्राफी जैसी जांचों से यह पता लगाया जा सकता है कि लिवर में कितनी चर्बी जमा है और कहीं उसमें फाइब्रोसिस (स्कारिंग) तो नहीं हो रही.
कुछ लिवर फंक्शन टेस्ट (एलएफ़टी) भी किए जाते हैं, जिनमें एसजीओटी और एसजीपीटी के स्तर की जांच होती है. कई बार इनका बढ़ा हुआ स्तर लिवर की समस्या का संकेत देता है.
इसके अलावा एक उपयोगी तरीका एफ़आईबी-4 स्कोर भी है. इसके लिए अलग से कोई नया टेस्ट कराने की ज़रूरत नहीं होती. इसमें व्यक्ति की उम्र, एसजीओटी, एसजीपीटी और प्लेटलेट्स के आधार पर स्कोर निकाला जाता है.
अगर यह स्कोर सामान्य से अधिक आता है, तो डॉक्टर आगे की जांच कराने की सलाह देते हैं, ताकि बीमारी की सही स्थिति का पता चल सके.
फ़ैटी लिवर वाले कैसे करें बचाव
सवाल: फ़ैटी लिवर को ठीक करने का सबसे अच्छा तरीक़ा क्या है?
जवाब: सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि फ़ैटी लिवर से बचाव कैसे किया जाए. इसका सबसे असरदार तरीक़ा है अपनी जीवनशैली में सुधार करना.
इसमें संतुलित खान-पान और नियमित व्यायाम सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इसके अलावा, शराब लिवर के लिए बेहद नुकसानदायक होती है, इसलिए इससे बचना चाहिए.
अगर किसी को फ़ैटी लिवर हो गया है, तो उसे ठीक करने के लिए रोज़ाना व्यायाम करना बहुत ज़रूरी है. साथ ही, खाने-पीने की आदतों में भी बदलाव करना चाहिए. भोजन में सैचुरेटेड फ़ैट कम रखें, प्रोटीन की मात्रा बढ़ाएं और कार्बोहाइड्रेट सीमित मात्रा में लें.
जहाँ तक हो सके, मीठी चीज़ों और शक्कर वाले पेय, जैसे कोल्ड ड्रिंक, से दूरी बनाए रखें. ज़्यादा मात्रा में चॉकलेट खाना भी नुक़सानदायक हो सकता है. रोज़ के भोजन में हरी सब्ज़ियाँ और ताज़े फल ज़रूर शामिल करें.
अगर किसी व्यक्ति को एक बार फ़ैटी लिवर हो जाता है, तो थोड़ी-सी शराब भी उसके लिवर को गंभीर नुक़सान पहुँचा सकती है.
मैं ज़ोर देकर कहना चाहूँगा कि जिस व्यक्ति को फ़ैटी लिवर है, उसे शराब पूरी तरह छोड़ देनी चाहिए.
सवाल: क्या फ़ैटी लिवर होने पर डॉक्टर के पास जाकर इलाज कराना ज़रूरी है, या इसे घर पर भी ठीक किया जा सकता है?
जवाब: सबसे पहले डॉक्टर से सलाह लेना ज़रूरी है, ताकि यह पता चल सके कि लिवर को कितना नुक़सान हुआ है. इसके बाद उसी हिसाब से इलाज तय किया जाता है. कई बार लिवर में फाइब्रोसिस (स्कारिंग) या कठोरता (स्टिफनेस) आ जाती है, जिससे लिवर को स्थायी नुकसान होने का ख़तरा बढ़ जाता है.
लेकिन अगर लिवर में सिर्फ़ फ़ैट जमा है और कोई गंभीर नुक़सान नहीं हुआ है, तो जीवनशैली में बदलाव करके भी फ़ैटी लिवर को काफ़ी हद तक ठीक किया जा सकता है. इसके लिए नियमित व्यायाम, शराब से पूरी तरह परहेज़ और संतुलित खान-पान बहुत ज़रूरी है.
डॉक्टर के मुताबिक, हफ्ते में कम से कम 5 दिन, रोज़ 45 मिनट से 1 घंटे तक व्यायाम करना चाहिए. इसके लिए तेज़ चाल से पैदल चलना (ब्रिस्क वॉक) सबसे अच्छा विकल्प है. इसकी सही गति यह मानी जाती है कि 10 मिनट में लगभग 1 किलोमीटर की दूरी तय की जाए.
अगर आप रोज़ करीब 6 किलोमीटर तक पैदल चलते हैं, तो यह आपके लिवर और पूरी सेहत के लिए बेहद फायदेमंद है.
डायबिटीज़ से कैसा है नाता
सवाल: डायबिटीज़ और फ़ैटी लिवर के बीच कितना गहरा संबंध है?
जवाब: डायबिटीज़ और फ़ैटी लिवर का आपस में बहुत गहरा संबंध है. जिन लोगों को डायबिटीज़ है, उनमें फ़ैटी लिवर होने का ख़तरा काफ़ी ज़्यादा रहता है. अगर किसी डायबिटीज़ के मरीज़ को फ़ैटी लिवर भी है, तो सबसे पहले उसकी ब्लड शुगर को नियंत्रित करना बेहद ज़रूरी है.
पहले कहा जाता था कि भारत डायबिटीज़ की विश्व राजधानी है, लेकिन अब यह भी कहा जाने लगा है कि भारत फ़ैटी लिवर के मामलों में भी दुनिया के सबसे प्रभावित देशों में शामिल है.
हाल ही में मेडिकल जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित एक अध्ययन में डायबिटीज़ के मरीज़ों का फाइब्रोस्कैन किया गया. इस अध्ययन के नतीजे काफी चिंताजनक थे. इसमें पाया गया कि डायबिटीज़ से पीड़ित लगभग 60 से 70 फ़ीसदी मरीज़ फ़ैटी लिवर की समस्या से भी जूझ रहे हैं.
सवाल: क्या ब्लैक कॉफ़ी फ़ैटी लिवर को कम करने में मदद करती है?
जवाब: इस बात के कई वैज्ञानिक प्रमाण हैं कि ब्लैक कॉफ़ी पीना लिवर के लिए फ़ायदेमंद हो सकता है. यह फ़ैटी लिवर की समस्या को कम करने में भी मदद कर सकती है. हालांकि, इसकी मात्रा सीमित रखनी चाहिए. दिन में अधिकतम 2 कप ब्लैक कॉफ़ी पीना ही बेहतर माना जाता है.
इससे ज़्यादा कॉफ़ी पीने से शरीर को नुक़सान भी हो सकता है.
सवाल: अगर किसी को फ़ैटी लिवर है, तो इसका दिल पर क्या असर पड़ता है? क्या हार्ट अटैक का ख़तरा बढ़ जाता है?
जवाब: फ़ैटी लिवर मेटाबॉलिक सिंड्रोम का एक हिस्सा है. इस सिंड्रोम में हाई ब्लड प्रेशर, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, असामान्य लिपिड्स और फ़ैटी लिवर जैसी समस्याएं एक साथ देखने को मिलती हैं.
ऐसे मरीज़ों में दिल की बीमारियों का ख़तरा काफ़ी बढ़ जाता है, और कई मामलों में मौत का सबसे बड़ा कारण भी हृदय रोग ही होता है. इसके अलावा, ऐसे लोगों में कुछ तरह के कैंसर का जोखिम भी अधिक हो सकता है.
अगर फ़ैटी लिवर का पता उस समय चलता है, जब लिवर को काफ़ी नुक़सान पहुंच चुका हो, तो लिवर से जुड़ी जटिलताओं का ख़तरा भी बढ़ जाता है. लेकिन कुल मिलाकर, हृदय रोग का जोखिम भी उतना ही गंभीर होता है.
इसी वजह से डॉक्टर सलाह देते हैं कि अगर किसी मरीज़ को फ़ैटी लिवर के साथ डायबिटीज़ भी है, तो उसकी पूरी जांच करानी चाहिए. इसमें लिवर के टेस्ट के साथ-साथ दिल की जांच भी ज़रूर शामिल होनी चाहिए.
लिवर कैंसर कैसे होता है और इलाज क्या है?
सवाल: लिवर कैंसर क्यों होता है और इसका इलाज क्या है?
जवाब: लिवर कैंसर होने की सबसे बड़ी वजहों में हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी वायरस शामिल हैं. ये वायरस लंबे समय तक लिवर को नुक़सान पहुंचाकर लिवर सिरोसिस (लिवर का गंभीर रूप से ख़राब होना) पैदा कर सकते हैं.
हालांकि, कुछ लोगों में लंबे समय तक वायरस रहने के कारण सिरोसिस हुए बिना भी लिवर कैंसर हो सकता है. लेकिन ज़्यादातर मामलों में लिवर सिरोसिस ही कैंसर की मुख्य वजह होता है, चाहे वह हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी या फ़ैटी लिवर के कारण हुआ हो.
पिछले 10 वर्षों में लिवर कैंसर के इलाज में काफ़ी प्रगति हुई है. इलाज तय करते समय डॉक्टर दो बातों पर सबसे ज़्यादा ध्यान देते हैं, पहली- मरीज़ को सिरोसिस है या नहीं, और दूसरी- कैंसर किस स्टेज में है.
अगर कैंसर सिर्फ लिवर तक सीमित है और शरीर के दूसरे हिस्सों में नहीं फैला है, तो डॉक्टर उसके आकार और यह देखते हैं कि कहीं वह खून की नसों तक तो नहीं पहुंचा है.
ऐसी स्थिति में लिवर ट्रांसप्लांट सबसे प्रभावी इलाज माना जाता है. कुछ मरीज़ों में सिर्फ़ कैंसर वाले हिस्से को सर्जरी से निकालना भी संभव होता है. लेकिन अगर सिरोसिस की वजह से लिवर बहुत ज़्यादा ख़राब हो चुका हो, तो लिवर ट्रांसप्लांट सबसे बेहतर विकल्प होता है और इसके नतीजे भी अच्छे मिलते हैं.
समस्या यह है कि ज़्यादातर मरीज़ डॉक्टर के पास तब पहुंचते हैं, जब कैंसर काफी बढ़ चुका होता है और आसपास की रक्त वाहिकाओं या शरीर के दूसरे अंगों तक फैल चुका होता है. ऐसे मामलों में इलाज अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है.
सवाल: लिवर कैंसर के इलाज में कितना ख़र्च आता है?
जवाब: इलाज का ख़र्च इस बात पर निर्भर करता है कि कैंसर किस स्टेज में है. अगर मरीज़ को लिवर ट्रांसप्लांट की ज़रूरत पड़ती है, तो इसका ख़र्च काफ़ी अधिक होता है. आमतौर पर इसका ख़र्च 18-20 लाख रुपये से लेकर 30-40 लाख रुपये तक हो सकता है.
सवाल: किन कारणों से किसी व्यक्ति का लिवर ख़राब हो सकता है?
जवाब: लिवर ख़राब होने की सबसे बड़ी वजह शराब का अधिक सेवन है. इसके अलावा हेपेटाइटिस ए, बी, सी और ई जैसे चार प्रमुख वायरस भी लिवर को प्रभावित करते हैं.
इनमें हेपेटाइटिस ए और ई आमतौर पर लंबे समय तक लिवर को नुक़सान नहीं पहुंचाते. लेकिन हेपेटाइटिस बी और सी लंबे समय तक शरीर में रहकर लिवर को गंभीर नुक़सान पहुंचा सकते हैं.
अच्छी बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में हेपेटाइटिस-सी के इलाज के लिए ऐसी दवाएं उपलब्ध हुई हैं, जिन्हें करीब 3 महीने तक लेने से 90 फ़ीसदी से ज़्यादा मरीज़ पूरी तरह ठीक हो जाते हैं. इसी वजह से अब हेपेटाइटिस-सी के मामले पहले की तुलना में काफ़ी कम हो गए हैं.
वहीं, हेपेटाइटिस-बी से बचाव के लिए प्रभावी वैक्सीन उपलब्ध है. इसलिए सरकार सभी नवजात बच्चों को इसका टीका लगवाने की सलाह देती है. जिन लोगों को हेपेटाइटिस-बी हो चुका है, उनके लिए भी अब अच्छी और प्रभावी दवाएं मौजूद हैं.
सवाल: लिवर हमारे शरीर में क्या काम करता है?
जवाब: लिवर हमारे शरीर का एक बेहद अहम अंग है. जहां हमारे पास दो किडनी और दो फेफड़े होते हैं, वहीं लिवर सिर्फ एक ही होता है. अगर एक किडनी या एक फेफड़ा खराब हो जाए, तो दूसरा कुछ हद तक काम संभाल सकता है. लेकिन अगर लिवर गंभीर रूप से ख़राब हो जाए, तो शरीर में कई तरह की समस्याएं पैदा हो सकती हैं.
लिवर शरीर में कई अहम काम करता है. यह ऊर्जा का सबसे बड़ा भंडार (स्टोरेज) है, जहां शरीर के लिए ग्लूकोज़ जमा रहता है. इसके अलावा, लिवर शरीर की एक फैक्ट्री की तरह काम करता है, जो कई ज़रूरी पदार्थों का निर्माण करता है. इतना ही नहीं, यह शरीर के हानिकारक और बेकार पदार्थों (वेस्ट) को बाहर निकालने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
सवाल: अगर लोग अपने लिवर को स्वस्थ रखना चाहते हैं, तो उन्हें अपनी जीवनशैली में क्या बदलाव करने चाहिए?
जवाब: लिवर से जुड़ी बीमारियों से बचने का सबसे प्रभावी तरीका स्वस्थ जीवनशैली अपनाना है.
इसके लिए नियमित व्यायाम करें, शराब से पूरी तरह दूरी बनाए रखें और किसी भी तरह के नशे से बचें. देखा गया है कि नशा करने वाले लोगों में हेपेटाइटिस वायरस का संक्रमण होने का ख़तरा अधिक होता है.
इसके अलावा, तली-भुनी और जंक फूड खाने से बचें. हमेशा संतुलित और पौष्टिक भोजन करें और समय पर खाना खाने की आदत डालें. यही आदतें लंबे समय तक लिवर को स्वस्थ रखने में मदद करती हैं.
अल्ज़ाइमर मरीजों के लिए बड़ी खुशखबरी: FDA ने घर पर लगने वाले LEQEMBI IQLIK इंजेक्शन को दी मंजूरी
वॉशिंगटन: अल्ज़ाइमर रोग के इलाज में एक बड़ी सफलता मिली है। अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने LEQEMBI IQLIK (लेकेनेमैब-आईआरएमबी) नामक नई सबक्यूटेनियस (त्वचा के नीचे लगने वाली) इंजेक्शन थेरेपी को शुरुआती अल्ज़ाइमर रोगियों के लिए मंजूरी दे दी है। यह दुनिया की पहली एंटी-एमिलॉयड थेरेपी है, जिसे उपचार की शुरुआत से ही ऑटो-इंजेक्टर के माध्यम से घर पर लगाया जा सकता है।
अब तक यह दवा मुख्य रूप से अस्पताल में नस (IV) के माध्यम से दी जाती थी, जिसके लिए मरीजों को नियमित रूप से अस्पताल जाना पड़ता था। नई मंजूरी के बाद मरीजों और उनके देखभाल करने वाले परिजनों को अधिक सुविधा मिलेगी और अस्पतालों पर भी बोझ कम होगा।
यह दवा उन मरीजों के लिए स्वीकृत की गई है, जिनमें हल्की याददाश्त की कमी (Mild Cognitive Impairment) या अल्ज़ाइमर से जुड़ा शुरुआती डिमेंशिया पाया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बीमारी का पता शुरुआती चरण में चल जाए और समय पर इलाज शुरू हो, तो रोग की प्रगति को धीमा किया जा सकता है।
क्लीनिकल अध्ययनों में पाया गया कि त्वचा के नीचे दिए जाने वाले LEQEMBI IQLIK इंजेक्शन का प्रभाव नस के माध्यम से दी जाने वाली दवा के समान है। यह मस्तिष्क में जमा होने वाले एमिलॉयड प्रोटीन को कम करने में प्रभावी है, जो अल्ज़ाइमर रोग के प्रमुख कारणों में से एक माना जाता है। साथ ही इसकी सुरक्षा प्रोफाइल भी IV उपचार जैसी पाई गई।
नई इंजेक्शन प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता इसका ऑटो-इंजेक्टर है, जिसकी मदद से इंजेक्शन कुछ ही सेकंड में लगाया जा सकता है। एक अध्ययन में अधिकांश मरीजों और उनके देखभालकर्ताओं ने इसे उपयोग में आसान और सुविधाजनक बताया। इससे बार-बार अस्पताल जाने की आवश्यकता कम होगी और इलाज को नियमित रूप से जारी रखना भी आसान होगा।
हालांकि, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह दवा अल्ज़ाइमर का पूर्ण इलाज नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य बीमारी की गति को धीमा करना है। उपचार के दौरान कुछ मरीजों में मस्तिष्क में सूजन (ARIA), सूक्ष्म रक्तस्राव, सिरदर्द, मतली या इंजेक्शन वाली जगह पर दर्द और सूजन जैसे दुष्प्रभाव हो सकते हैं। इसलिए इलाज शुरू करने से पहले और उपचार के दौरान समय-समय पर MRI जांच तथा डॉक्टर की निगरानी आवश्यक है।
कंपनी के अनुसार LEQEMBI IQLIK अमेरिका में अगस्त 2026 के अंत तक उपलब्ध होने की उम्मीद है। चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि यह मंजूरी अल्ज़ाइमर के उपचार में एक महत्वपूर्ण बदलाव साबित हो सकती है। घर पर इंजेक्शन की सुविधा से लाखों मरीजों को अधिक आरामदायक, सुरक्षित और सुलभ उपचार मिल सकेगा तथा भविष्य में इस तकनीक से विश्वभर के मरीजों को लाभ मिलने की संभावना है।
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